Thursday, January 22, 2015

" लूट गए हैं हम तो वफायें निभाने में....

टीस बाकि है शायद दिल के किसी खाने में , अभी तकलीफ बहुत होती है मुस्कुराने में.. !

वक्त के साथ सबके चेहरे बदल जाते हैं , डर सा लगता है अब तो दोस्त भी बनाने में.. !
जो न ढाला खुद को वक्त के टकसाल में , चला है ऐसा सिक्का कब इस ज़माने में.. !
शमा दिया था खुदा ने रौशनी लुटाने को , लगा दिया है उसे नशेमन जलाने में.. !
शहर के तौर-तरीके हमने सीखा न , लूट गए हैं हम तो वफायें निभाने में.. !!
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