Monday, February 2, 2015

जिस दिन से तुम रूठी हो ....


उस की खट्ठाई आँखों में है, जंतर मंतर, सब.
चाकू वाकू, छुर्रियाँ वुर्रियाँ, खंजर वंजर, सब !

जिस दिन से तुम रूठे हो, मुझसे रूठे-रूठे हैं.रूठी 
चद्दर वद्दर, तकिया वकिया, बिस्तर विस्तर, सब !

मुझ से बिछड़ कर अब वो भी कहाँ पहले जैसी है.
फीके पड़ गये, कपड़े वपड़े, जेवर वेवर, सब !

आखिर मैं किस दिन डूबूंगा फिकर करते हैं.
दरिया वरीया, कश्ती वश्ती, लंगर वंगर, सब !

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